₹33,000 करोड़ खर्च, कागजों में पोषण, जमीन पर हर तीसरे बच्चे में कुपोषण

घोटाले, घपलों के कारण कुपोषण का दानव हर साल छीन रहा लाखों बच्चों की जिंदगी

सरकार चीख-चीख कर दुनिया को बता रही है कि भारत की अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ रही है। यहां निवेश का सुनहरा मौका है। जल्दी आओ और खूब निवेश करो। दूसरी तरफ देश के लाखों बच्चे कुपोषण के कारण अल्प आयु में ही दम तोड़ रहे हैं।

हर साल कुपोषण खत्म करने के नाम पर करीब 33 हजार करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। कागजों पर पोषण जमकर हो रहा है, लेकिन जमीन पर हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है।

घोटालेबाज कुपोषित बच्चों के दुश्मन

कुपोषण खत्म करनेकी योजना वर्षों से चलाई जा रही है। अरबों रुपया खर्च किया जा चुका है। फिर भी कुपोषण का दानव जीवित है। बच्चों को अपना शिकार बना रहा है। इस दानव को जिंदा रखने वाले घोटालेबाज अफसर और नेता हैं।

चर्चित पोषण आहार घोटाला

भारत मेंपोषण आहार वितरण प्रणाली (ICDS) में पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े घोटाले सामने आए हैं। इन घोटालों ने न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया, बल्कि लाखों कुपोषित बच्चों और गर्भवती महिलाओं के हक का पोषण भी छीन लिया। कुछ चर्चित पोषण आहार घोटाले की जानकारी नीचे दी गयी है।

  1. मध्य प्रदेश टेक होम राशन घोटाला/ (2022) में सामने आया। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में इस बड़े घोटाले का खुलासा हुआ था। कागजों पर उन ट्रकों के नंबरों से राशन की ढुलाई दिखाई गई, जो असल में मोटर साइकिल, ऑटो-रिक्शा और कार के नंबर थे। करीब ₹110 करोड़ का राशन बिना किसी वास्तविक परिवहन के वितरित दिखा दिया गया।

  2. महाराष्ट्र आंगनवाड़ी पोषण घोटाला/ जानकारी के मुताबिक 2012 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त कमिश्नर की रिपोर्ट में इस ₹1,000 करोड़ के घोटाले का पर्दाफाश हुआ था। कोर्ट के आदेश थे कि राशन की आपूर्ति स्थानीय महिला मंडलों या स्वयं सहायता समूहों द्वारा की जानी चाहिए, लेकिन निजी ठेकेदारों ने फर्जी ‘महिला मंडल’ बनाकर ठेके हासिल कर लिए। जांच में पाया गया कि बच्चों को मिलने वाला आहार इतना खराब था कि वह जानवरों के खाने लायक भी नहीं था।

  3. उत्तर प्रदेश ‘पॉन्टी चड्ढा’ सिंडिकेट घोटाला/ वर्षों से पोषण आहार आपूर्ति पर कुछ खास व्यापारिक समूहों का एकाधिकार रहा। टेंडर में ऐसी शर्तें जोड़ी गईं (जैसे भारी टर्नओवर) जिन्हें स्थानीय समूह पूरा नहीं कर सकते थे। इसके परिणामस्वरूप अरबों रुपये का पोषण बजट निजी कंपनियों के हाथों में चला गया और लाभार्थियों तक घटिया पोषण आहार परोसा गया।

  1. बिहार मिड-डे मील और ‘सत्तू’ घोटाला / इसमें स्कूल के बच्चों के लिए दोपहर के भोजन (Mid-day Meal) और आंगनवाड़ी के राशन वितरण में समय-समय पर बड़े घोटाले सामने आए हैं। जिलों में बिना बच्चों की उपस्थिति के कागजों पर भोजन वितरण दिखाया गया। 2013 के सारण कांड के बाद जांच में सामने आया कि पोषण आहार के नाम पर खरीदे गए अनाज और तेल में मिलावट थी। करोड़ों रुपये की सत्तू खरीद में फर्जी बिलिंग और घटिया गुणवत्ता के गंभीर आरोप लगे थे।

बच्चों की थाली से पोषण गायब

भारत ने कुपोषण घटाने के लिए बड़े-बड़े मिशन चलाए, योजनाएं बदलीं, ऐप बनाए, लेकिन जमीनी सच यह है कि बच्चों की थाली में पोषण अब भी पूरा नहीं उतर रहा। NFHS-5 बताता है कि 5 साल से कम उम्र के 35.5% बच्चे स्टंटेड, 19.3% वेस्टेड और 32.1% अंडरवेट हैं। यानी कुपोषण अब भी “अपवाद” नहीं, व्यवस्था की रोजमर्रा की बीमारी है।

डेटा ट्रैकिंग में धांधली

सरकार कापोषण ट्रैकर लाखों बच्चों की माप-तौल का डेटा दिखाता है, पर यही डेटा बताता है कि कवरेज और फॉलोअप की खामियां भी बनी हुई हैं। कई जगह बच्चे सिस्टम में देर से आते हैं, नियमित माप नहीं होती, और जो चिन्हित होते हैं, उन्हें समय पर गुणवत्ता वाला भोजन और इलाज नहीं मिल पाता।

हजारों करोड़ खर्च, नतीजा सिफर

पैसेकी कमी की दलील भी पूरी तस्वीर नहीं बताती। 2024-25 में सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के लिए ~₹21,200 करोड़ और पीएम-पोषण (स्कूल भोजन) के लिए ~₹12,467 करोड़ का बजटीय प्रावधान दिखता है। यानी सिर्फ दो बड़े हेड में ही कम-से-कम ~₹33 हजार करोड़ का आवंटन, फिर भी नतीजे “मिशन मोड” जैसे नहीं।

123 देशों में से 103वें स्थान पर

वैश्विक स्तर पर भीस्थिति चिंता बढ़ाती है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 में भारत 103/123 पर है, जिसे “Serious” श्रेणी में रखा गया है। विशेषज्ञ बताते हैं कि समस्या सिर्फ भोजन की नहीं – एनीमिया, गंदा पानी, संक्रमण, कमजोर पूरक आहार, और गर्भ से 2 साल तक के ‘1000 दिन’ में हुई चूक का गठजोड़ है। WHO/UNICEF के अनुसार 5 साल से कम उम्र की मौतों में अंडरन्यूट्रिशन का बड़ा योगदान रहता है, इसलिए इसे “छोटी समस्या” मानना खतरनाक है।

कैसे होगा समस्या का समाधान

  1. आहार में विविधता: केवल चावल-गेहूं के बजाय मोटे अनाज (मिलेट्स), अंडे और दालों को अनिवार्य बनाना।

  2. नियमित निगरानी: ‘पोषण ट्रैकर’ का उपयोग कर हर बच्चे की वृद्धि (Growth Monitoring) को ट्रैक करना।

  3. स्वच्छता मिशन से जुड़ाव: कुपोषण को केवल ‘भोजन’ नहीं बल्कि ‘स्वच्छ पानी और स्वच्छता’ से जोड़कर देखना।

  4. मातृ पोषण: गर्भावस्था के दौरान माताओं के पोषण और स्वास्थ्य पर विशेष निवेश करना।

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